भारत में वस्त्र क्षेत्र की क्रांतिः एक उदीयमान उपभोक्ता पावरहाउस की गाथा
केन्द्रीय वस्त्र मंत्री, श्री गिरिराज सिंह
परिवर्तन का एक दशक – समृद्ध भारत का उदय
एक दशक पूर्व भारत की जनसंख्या लगभग 125 करोड़ थी। उपभोक्ताओं का खर्च मुख्य रूप से इच्छा के बजाय आवश्यकता से प्रेरित होता था। खरीदारी का पूर्वानुमान लगाना बहुत ही आसान थ ।। त्योहारों के लिए नए कपड़े, सावधानीपूर्वक योजना आधारित खर्च और फिजूलखर्ची की बजाय बचत पर ध्यान केंद्रित किया जाता था। लक्जरी ब्रांडों की दूर से प्रशंसा की जाती थी। उच्च श्रेणी का फैशन अभिजात वर्ग तक ही सीमित था। आज देश की जनसंख्या लगभग 142 करोड़ हो गई है। मध्यम वर्ग तेजी से बढ़त की ओर है। वही परिवार पूरे आत्मविश्वास से प्रीमियम स्टोर में कदम रखता है। वही परिवार आसानी से ऑनलाइन खरीदारी करता है। इतना ही नहीं, अपने जीवन में अनेक अवसरों को उत्सव के तौर पर देखता है। भारत अब न केवल आगे बढ़ रहा है, बल्कि यह समृद्ध भी हो रहा है।
बढ़ती क्रय शक्ति, विकसित हो रही उपभोक्ता मानसिकता और अंतिम-मील डिजिटल कनेक्टिविटी ये तीनों इस बदलाव के मुखय वाहक हैं। आर्थिक सुधार अभूतपूर्व रहा है। इसे बढ़ती आय, सरकार समर्थित विनिर्माण पहल और डिजिटल रूप से सशक्त भारत के माध्यम से पंख लगे है। 2020 में ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना शुरू की गई। इस विजन ने आत्मनिर्भरता की नींव रखी। इसे प्रोडकशन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना और पीएम मित्र टेक्सटाइल पाकों द्वारा और सशक्त किया गया। जैसे-जैसे विनिर्माण में उछाल आया, रोजगार सृजन हुआ और इसके साथ ही डिस्पोजेबल आय में वृद्धि हुई। इसके परिणामस्वरूप भारतीयों के खर्च करने के तरीके बदल गए। उपभोग अब भारत को विकास की गाथा के केंद्र में है, जो कपड़ा क्षेत्र को स्वर्ण युग में ले जाने के लिए तैयार है।
एक सशक्त भारत आत्मविश्वास से परिपूर्ण, साहसी और आकांक्षी
पिछले कई वर्षों में, आकांक्षाए सचमुच वास्सस्विकता से आगे निकल गईं। लोगों ने कड़ी मेहनत की, बड़े सपने देखे, फिर भी अवसर पहुंच से बाहर लगे। फिर नीति-संचालित परिवर्तन के एक दशक ने महत्वाकांक्षा को उपलब्धि में बदल दिया। इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हुआ, डिजिटल इंडिया ने आकार लिया और आर्थिक सुधार मूर्त विकास का इंजन बन गए। इसके प्रभाव से भारत एक गुणवत्ता, शैली और सुविधा को अपनाने के लिए तैयार आत्मविश्वासी उपभोक्ताओं वाले देश के रूप में विकसित हो गया।
आय में उछाल आया है। प्रति व्यक्ति आय 2014-15 में 72,805 रुपए से बढ़कर 2023-24 में 1.88 लाख रुपए हो गई है और 2030 तक 3.5 लाख रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। आज छह करोड़ भारतीय सालाना 8.3 लाख रुपए से अधिक कमाते हैं 2015 की संख्या से दोगुने से भी अधिक है। यह बढ़ती समृद्धि फैशन, कपड़ा और जीवन शैली वाले उत्पादों की अभूतपूर्व मांग को बढ़ावा दे रही है। 2027 तक, भारत चौथा सबसे बड़ा उपभोक्ता टिकाऊ बाजार होगा, जो न केवल सामर्थ्य बल्कि आकांक्षाओं से प्रेरित होगा।
कोविड के बाद उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव एक गेम चेंजर रहा है। डिजिटल पहुंच बढ़ी, ऑनलाइन रिटेल फला-फूला और यूपीआई लेनदेन आसमान छू गया। वित्त वर्ष 2013-14 में 220 करोड़ से इस डिजिटल परिवर्तन ने शहरी-ग्रामीण विभाजन को पाट दिया है। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि चाहे मेट्रो शहर में रहें या छोटे शहर में, भारतीयों के पास अब वैश्विक और स्थानीय फैशन तक निर्बाध पहुंच है।
भारत की फैशन क्रांति परंपरा का महत्वाकांक्षा से मिलन
कभी पश्चिमी अवधारणा, फास्ट्र फैशन अब युवा भारतीयों के लिए जीवन का एक तरीका है। जो कभी अनन्य था, वह अब पहुंच के भीतर है। इसका श्रेय ज्यूडियो, रिलायंस ट्रेंड्स और शीन जैसे ब्रांडों को जाता है। ये ब्रांड 10 बिलियन डॉलर के उद्योग को बढ़ावा दे रहे हैं। यह कारोबार 2030 तक 50 बिलियन डॉलर तक पहुंचने के लिए तैयार है। लेकिन यह बदलाव केवल सामर्थ्य के बारे में नहीं है लक्जरी और विरासत वाले वस्त्र फास्ट्र फैशन के साथ-साथ फल-फूल रहे हैं। जैसे-जैसे आकांक्षी परिवार 2027 तक 100 मिलियन का आंकड़ा पार कर रहे हैं, हस्तनिर्मित कपड़े, रेशम की साड़िया और उच्च श्रेणी के डिजाइनर परिधान फिर से उभर रहे हैं।
यह क्रांति कोई संयोग भर नहीं है। यह सरकार द्वारा संचालित पहलों का प्रत्यक्ष परिणाम है। बिचौलियों को