पंजाब सरकार ने जलवायु अनुकूल और टिकाऊ बागवानी पर टेक्नोलॉजी एक्सचेंज वर्कशॉप की मेज़बानी की
जेआईसीए प्रतिनिधिमंडल ने बागवानी मंत्री मोहिंदर भगत से पीसीआरईएसएचपी के अंतर्गत सहयोग पर की चर्चा
चंडीगढ़, 27 अगस्त:Aaj Tak Aamne saamne
मुख्यमंत्री स भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में पंजाब सरकार बागवानी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने के लिए ठोस कदम उठा रही है। इसी दिशा में, पंजाब और जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीए) ने संयुक्त रूप से “पंजाब में जलवायु अनुकूल और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ बागवानी (पीसीआरईएसएचपी) को बढ़ावा देने” विषय पर भागीदारों के साथ नई तकनीक के आदान-प्रदान पर एक वर्कशॉप का आयोजन किया। यह कार्यक्रम कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) परिसर, सेक्टर-31, चंडीगढ़ में हुआ।
इस अवसर पर बागवानी मंत्री श्री मोहिंदर भगत ने जेआईसीए प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया, जिसमें फर्स्ट सेक्रेटरी (खाद्य एवं कृषि) श्री हेयासे ताकेहीको, जेआईसीए इंडिया के वरिष्ठ प्रतिनिधि श्री ईजी वाकामात्सु, सर्वे टीम लीडर श्री शिनोहारा टोगो और विकास विशेषज्ञ श्रीमती निष्ठा वेंगुर्लेकर शामिल थे। सीआईआई चंडीगढ़ के चेयरपर्सन श्री अमित जैन भी उपस्थित रहे। मंत्री ने तकनीक हस्तांतरण और नवीन अभ्यासों के माध्यम से पंजाब की बागवानी को और सशक्त बनाने में सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
30 सदस्यीय जेआईसीए दल ने मंत्री श्री मोहिंदर भगत से मुलाकात कर “पंजाब फसली अवशेष प्रबंधन और टिकाऊ बागवानी परियोजना (पीसीआरईएसएचपी)” के अंतर्गत साझेदारी पर चर्चा की। इसमें फसली विविधता, टिकाऊ संसाधन प्रबंधन और किसानों के हित में उन्नत तकनीक के उपयोग पर विचार-विमर्श हुआ।
श्री मोहिंदर भगत ने कहा कि पंजाब की बागवानी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रही है और सरकार किसानों को आधुनिक तकनीक तथा अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता प्रदान करने के लिए वचनबद्ध है। उन्होंने कहा, “जेआईसीए के सहयोग से पंजाब का लक्ष्य फसली विविधता को प्रोत्साहित करना, लागत कम करना और किसानों की आय बढ़ाना है।”
फर्स्ट सेक्रेटरी श्री हेयासे ताकेहीको ने कहा कि पंजाब की बागवानी में अपार संभावनाएं हैं और जापान किसानों को लाभान्वित करने हेतु तकनीक, प्रशिक्षण और टिकाऊ पद्धतियों से सहयोग देगा।
वर्कशॉप के दौरान कई सत्र आयोजित हुए जिनमें नियंत्रित वातावरण बागवानी, कृषि-तकनीक आधारित समाधान, कम-कार्बन बागवानी तथा भारत-जापान के बीच अकादमिक सहयोग जैसे विषय शामिल थे। इन सत्रों ने विशेषज्ञों को प्रस्तुति, संवाद और विचार-विमर्श का मंच प्रदान किया।