**“प्रधानमंत्री मोदी व्यवहारिक हैं : कोई आर्थिक आपातकाल नहीं”*— एम. चूबा आओ**

**“प्रधानमंत्री मोदी व्यवहारिक हैं : कोई आर्थिक आपातकाल नहीं”**

**— एम. चूबा आओ**

*”जो कुछ बचा हुआ है उसे एकत्र करो, ताकि कुछ भी व्यर्थ न जाए।”*

इन दिनों हर कोई मितव्ययिता (Austerity) उपायों की चर्चा कर रहा है। शायद इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की अपील से हुई। श्री मोदी ने नागरिकों से आग्रह किया—सोना खरीदना कम करें, खाद्य तेल का कम उपयोग करें, आयातित वस्तुओं से बचें, विदेश यात्राओं को सीमित करें, उर्वरकों का कम उपयोग करें, घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) को बढ़ावा दें, ईंधन की अनावश्यक खपत से बचें और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें।

तकनीकी रूप से देखें तो ये मितव्ययिता के कठोर उपाय नहीं हैं। ये एक ऐसे नेता की सरल किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण अपीलें हैं जो राष्ट्र का नेतृत्व अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर करना चाहता है। इनमें से कुछ खर्च वास्तव में अनावश्यक और अपव्ययी हैं।

ऐसी अपील केवल एक ईमानदार प्रधानमंत्री ही कर सकता है। मेरी दृष्टि में, सत्तर के दशक की आयु में पहुंचे नागरिक होने के नाते हममें से कोई भी ऐसी अपील कर सकता था। नागालैंड में तो कोई भी गांव का बुजुर्ग ऐसी सलाह दे सकता था। दूसरे शब्दों में, ये न तो प्रतिबंध हैं और न ही कोई अनिवार्य आदेश।

इन अपीलों को अपनाना केवल राष्ट्रहित में है। यह पूरी तरह एक व्यवहारिक और दूरदर्शी कदम है।

हमारे आदरणीय मोदी जी चाहते हैं कि देशवासी वही करें जो राष्ट्र के व्यापक हित में हो। इसलिए किसी संकट की आशंका को लेकर अनावश्यक घबराहट उचित नहीं है। लेकिन साथ ही, जब पूरी दुनिया एक युद्ध जैसी परिस्थिति का सामना कर रही हो, विशेषकर ऐसे क्षेत्र में जो विश्वभर को तेल की आपूर्ति करता है, तब हम आंखें मूंदकर भी नहीं बैठ सकते।

वर्तमान परिस्थितियों में हम सभी को उन चुनौतियों को लेकर चिंतित होना चाहिए जो आने वाले महीनों और वर्षों में हमारे सामने आ सकती हैं।

एक राष्ट्र के रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था ने निश्चित रूप से अच्छा प्रदर्शन किया है। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक जटिल व्यवस्था है। इसका संचालन अच्छे मानसून और नियंत्रित तेल कीमतों जैसे कारकों पर भी निर्भर करता है। इसलिए संभावित भविष्य संकट के लिए पहले से तैयारी करना बुद्धिमानी है और प्रधानमंत्री ने राष्ट्र से स्थिति की गंभीरता को समझने का सही आग्रह किया है।

कार पूलिंग और वर्क फ्रॉम होम भी राष्ट्रहित में हैं, क्योंकि बड़े शहरों में ट्रैफिक जाम और प्रदूषण बड़ी चुनौतियां बन चुके हैं।

अब इस विषय के दूसरे पहलू को देखें। अमेरिका–ईरान युद्ध और उसके परिणामस्वरूप होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से भारत के कच्चे तेल के भंडार में अनुमानतः 15 प्रतिशत की गिरावट का दबाव देखा गया है।

फिर भी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने परिस्थितियों को अच्छी तरह संभाला है। दक्षिण-पूर्व एशिया के उन चुनिंदा देशों में भारत शामिल है जिसने घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि नहीं की और न ही आपूर्ति पर राशनिंग लागू की।

आज तेल विपणन कंपनियां (Oil Marketing Companies) कच्चा तेल, गैस और एलपीजी अधिक कीमत पर खरीद रही हैं, लेकिन उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए अंतिम उत्पाद कम कीमत पर बेच रही हैं, जिसके कारण उन्हें प्रतिदिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये तक का भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। क्या हम इसकी व्यापकता की कल्पना कर सकते हैं?

प्रधानमंत्री ने अपनी अपील में वैश्विक संकट को भारत के कृषि आयातों से भी जोड़ा है। उन्होंने कहा कि देश विदेशों से बड़े पैमाने पर रासायनिक उर्वरक आयात करता है।

उन्होंने कहा:
*”एक और क्षेत्र जो विदेशी मुद्रा का बड़ा उपभोग करता है, वह हमारी कृषि है। हम विदेशों से भारी मात्रा में रासायनिक उर्वरक आयात करते हैं।”*

आइए इस तथ्य की सराहना करें कि उर्वरक उपयोग कम करने की प्रधानमंत्री की अपील का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि 2022 से 2026 के बीच सरकार का उर्वरक सब्सिडी बिल 6.77 लाख करोड़ रुपये के विशाल स्तर तक पहुंच गया। इसका कारण वह मूल्य संरचना है जिसके अंतर्गत किसानों को 45 किलो यूरिया की बोरी मात्र 242 रुपये में मिलती है, जबकि उसकी वास्तविक लागत लगभग 2,200 रुपये होती है।

अंततः, मोदी जी के सुझावों का सकारात्मक प्रभाव केंद्र सरकार के आर्थिक बोझ को कम करने और विदेशी मुद्रा के अनावश्यक बहिर्वाह को रोकने में सहायक हो सकता है।

प्रधानमंत्री की सात सूत्रीय “अपील संहिता” को नागरिकों को लंबे समय तक जारी रहने वाली भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के लिए तैयार करने के एक ईमानदार प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। यह एक व्यवहारिक कदम है।

हम जिन आर्थिक चुनौतियों और संभावित झटकों का सामना कर रहे हैं, वे दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों की मांग करेंगे और हमें उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए।

**समाप्त**

*(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)*